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न कोई जादू हुआ न ही वह जादूगर है, जगन के जुनून और जिद बनाया विजयी

न कोई जादू हुआ न ही वह जादूगर है। जो भी कमाल हुआ उसके पीछे उनकी सालों की जमीनी मेहनत है। राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है, लेकिन उसके लिए लक्ष्य और योजना की जरूरत होती है। ऐसा ही लक्ष्य जगन रेड्डी के पास था। मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने का लक्ष्य और उसके लिए उनके पास थी बड़ी योजना। जगन के जिद और जुनून ने ही उन्हें जननायक बना दिया।

आंध्र प्रदेश की राजनीति में जगन मोहन रेड्डी जननायक बनकर उभरे हैं। यूं ही कोई जननायक नहीं बनता। इसके लिए जिद और जुनून की जरूरत होती है। जगन ने भी आंध्र प्रदेश की खाक छानी है। दिन-रात एक किया है। तब जाकर जगन मोहन जनता का नेता बने हैं।

जगन रेड्डी ने देश के उन तमाम हमउम्र नेताओं के लिए मिशाल पेश किया है जो अपनी हार के लिए ईवीएम और जाति की राजनीति को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। जगन ने साबित किया कि यदि नेता सोशल मीडिया और एसी कमरों से बाहर निकलकर जनता के बीच जायेंगे तो निश्चित ही इतिहास बनायेंगे।

जगन की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के साथ हुए आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में 175 में से 151 सीटों पर जीत दर्ज की। इतना ही नहीं उनकी पार्टी ने राज्य की 25 लोकसभा सीटों में से 22 पर जीत दर्ज की है। यह जीत कई मायनों में बहुत अलग है। जगन की जीत पर किसी को संशय नहीं था। विपक्षी दल भी जगन के जनाधार को देखकर घबरा गए थे।

जिस कुप्पम में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू चुनाव प्रचार तो दूर नामांकन करने भी कभी नहीं गए थे वहां जगन की लोकप्रियता से घबरा कर पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव की बेटी और मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की पत्नी नारा भुवनेश्वरी को पहली बार प्रचार के लिए मैदान में उतरना पड़ा था।

आंध्र प्रदेश के चुनाव नतीजों से एक बात साफ हो गई कि जो जमीन पर काम करेगा जनता उसे ही जननायक बनायेगी। सोशल मीडिया पर ट्वीट करने और चुनाव के दौरान सभा करने से जीत हासिल नहीं होगी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, लालू यादव के बेटे तेजस्वी जैसे नेताओं को जगन से सीख लेनी चाहिए।

उथल-पुथल रहा राजनीतिक सफर

जगन रेड्डी को राजनीति विरासत में मिली। वह राजनीति में इत्तेफाक से नहीं आए। हां यह जरूर है कि राजनीति में आने के बाद से ही उनका संघर्ष शुरु हुआ।

छोटे कारोबारी से शक्तिशाली नेता तक के दो दशक लंबे अपने करियर में वाईएसआर कांग्रेस अध्यक्ष जगनमोहन रेड्डी के पास अच्छे और बुरे, दोनों का अनुभव है। कारोबारी के रूप में जगन का एक दशक तक का कॅरियर बिना किसी परेशानी वाला था।

पिता की छत्रछाया में रेड्डी ने कारोबार को चमकाया लेकिन दूसरे दशक में राजनीति में आने के बाद उनकी जिन्दगी काफी उथल-पुथल भरी रही। हालांकि तमाम बाधाओं के बावजूद रेड्डी ने आंध्र प्रदेश में शानदार जीत हासिल की।

आंध्र प्रदेश (अविवाभाजित) के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वाई एस राजशेखर रेड्डी के इकलौते बेटे जगनमोहन रेड्डी ने 1999-2000 में अपना कारोबारी कॅरियर पड़ोसी राज्य कर्नाटक में संदूर नाम की एक पावर कंपनी स्थापित कर शुरू किया था।

इस कंपनी को उन्होंने पूर्वोत्तर भारत तक पहुंचाया। जगन का कारोबार उनके पिता राजशेखर रेड्डी के 2004 में मुख्यमंत्री बनने के बाद फलने-फूलने लगा। उन्होंने सीमेंट संयंत्र, मीडिया और विनिर्माण क्षेत्र में भी प्रसार शुरू किया।

2004 में चुनाव लडऩे की जाहिर की इच्छा

2004 में जगन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पता चला। वह कडप्पा से सांसद बनने की कोशिश किए लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने उनकी इस इच्छा को वहीं दफन कर दिया।

सांसद बनने के लिए जगन को पांच साल इंतजार करना पड़ा और आखिरकार 2009 में कडप्पा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज कर उन्होंने राजनीति में कदम रखा।

उस समय जगन को जरा भी एहसास नहीं था कि उनका राजनीतिक सफर आसान नहीं होने वाला है। पिता की छत्रछाया में जगन को कारोबारी से सांसद बनने तक कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन 2009 में हेलीकाप्टर दुर्घटना में पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद सबकुछ बदल गया।

 रेड्डी  को मुख्यमंत्री बनाने से सोनिया गांधी ने किया इनकार

पिता की मृत्यु के बाद जगन रेड्डी की असली परीक्षा शुरु हुई। वाई एस राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए जगन सोनिया गांधी से मिले, लेकिन उनकी बात नहीं बनी। उन्हें पिता की मौत के बाद राज्य में श्रद्धांजलि यात्रा तक निकालने की अनुमति नहीं मिली।

इतना ही नहीं जगन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए 177 में से 170 विधायकों ने उन्हें अपना समर्थन दे दिया, बावजूद इसके कांग्रेस ने सबकुछ नजरदांज कर रोसैय्या को राज्य का नया मुख्यमंत्री बना दिया। इस फैसले से जगन बहुत आहत हुए। नाराज रेड्डी ने कांग्रेस से अलग होकर नयी पार्टी के गठन का ऐलान किया।

2011 में हुआ वाईएसआर कांग्रेस का गठन

साल 2011 में जगन  रेड्डी  ने वाईएसआर कांग्रेस का गठन किया और अपने बलबूते राजनीतिक संघर्ष शुरू किया। रेड्डी के साथ 18 कांग्रेस विधायक कांग्रेस छोड़कर वाईएसआर में शामिल हो गए। इन 11 सीटों पर साल 2012 में उपचुनाव हुए, जिसमें 15 सीटों पर वाईआरएस ने जीत दर्ज कर सबको चौका दिया।

जगन का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। वह कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेदेपा से टक्कर लेते रहे, इस दौरान उन्हें जेल तक जाना पड़ा। इस दौरान 2014 के चुनाव में वह तेदेपा के हाथों हार गए।

हार के बाद किया मंथन

2014 में मिली हार के बाद जगन ने मंथन शुरु किया। राजनीति का गणित समझने में रेड्डी की 341 दिन की पदयात्रा बेहद महत्वपूर्ण रही। 2014 की हार के बाद रेड्डी ने जनता तक पहुंचने और लोगों से मिलकर उन्हें समझने और समझाने के लिए नवंबर 2017 से कडप्पा जिले के इडुपुलापाया से पदयात्री शुरू की।

इस दौरान रेड्डी  राज्य के 134 विधानसभा क्षेत्रों में गए जहां उन्होंने करीब दो करोड़ लोगों से मुलाकात की। उनकी इस यात्रा ने लोगों को उनसे जोड़ा। उनकी पदयात्रा जनवरी 2019 में समाप्त हुई और मई में जनता ने उन्हें जननायक बना दिया।

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